मैं यही देख रहा था कि सड़क जाती है
फिर वही राह मुसाफ़िर में भटक जाती है
इस लिए हम ने उसे दूर किया है ख़ुद से
जान पहचान मोहब्बत के तलक जाती है
मैं नज़र फेर के जाऊँ तो कहाँ जाऊँगा
ज़ुल्फ़ से हट के ये झुमके पे अटक जाती है
ख़्वाब महताब-जबीं तख़्त-नशीं वालों के
हम फ़क़ीरों को वही रात खटक जाती है
— Subodh Sharma "Subh"















