कामिल ज़िन्दगी

फिर एक दिन होगा यूँ
जंग जीत लेगी ये रूह
निकल बदन के क़फ़स से बाहर

और दिखाई देगा वो
जो न देखा और सुना था

मुफ़लिस को मिला सुकून का महल
पीड़ित ने किया अपराधियों का विनाश
दंगों के स्थल पर एकता की ख़ुशबू
किसानों को मिली भूख़ से नजात
सियासत ने मज़हब को छोड़ इंसानियत स्वीकार ली
यतीमों के हिस्से वालिदैन
माँ के होंठों पे बच्चों की दी मुस्कान
पिता के पैरों में मख़मली जूते
बहनों को उन के सपनों से रूबरू
सैनिक के बहते ख़ून से खिलते सरहदी गुलिस्ताँ
अँधेरों में खेलते बेबाक़ बच्चे
लेखक के क़लम में अनंत स्याही
तसव्वुर का हक़ीक़त बनना
रोते चहरों को हसी की लत
सपीद-ओ-सियाह दोनों ही रंग ख़ुश-रंग और यकसाँ नज़र आए
हीर-रांझा को मुहब्बत मिले, मौत नहीं
शहर आख़री साँस लेने गाँव चला आए
दरख़्त अर्श छू ले और फ़ल सारे आसमानी हो
बुराई का अच्छाई के सामने घुटने टेकना
जानवरों में इंसानी ज़बान
मरहलों की आसानी में तब्दीली
मशक़्क़त में टपका पसीना सहरा को समुन्दर कर दे
जलते चराग़ और चलती सबा दुश्मनी भुला दे
अज़ीयत की गिरफ़्त से ख़ुशियों की रिहाई
इन्साफ़ का परचम बुलंद
ख़ुदाओं का फ़लक से उतरना
नफ़रत को मोहब्बत से मोहब्बत

सब होगा उस दिन मुमकिन
जिस दिन नामुमकिन कुछ नहीं होगा

और दुनिया को बधाई देने
शायद बुत रहेंगे
यक़ीनन इंसान नहीं रहेगा

— Zain Aalamgir

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