दूर ही से निहार लेंगे हम
तुम को शर्मिंदा क्या करेंगे हम
सूफ़ियों की तरह जिएँगे हम
दर्द में रक़्स भी करेंगे हम
मुस्कुरा कर करो हमें रुख़्सत
तुम भी रोए तो क्या करेंगे हम
दे के जाते हो ज़िंदगी की दु'आ
क्या तुम्हारे बिना जिएँगे हम
अपने घर में भले लड़ें झगड़ें
एक ही छत तले रहेंगे हम
पहले माँ-बाप की करें ख़िदमत
बाल-बच्चे भी पाल लेंगे हम
ईद का रोज़ है चलो 'बादल'
आज उन से गले मिलेंगे हम
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