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चेहरा सबब बग़ैर नहीं मेरा ज़र्द है  - Akhtar Madhupuri

चेहरा सबब बग़ैर नहीं मेरा ज़र्द है
दिल पर लगी है चोट कलेजे में दर्द है

गुज़रा है इस तरफ़ से कोई कारवाँ ज़रूर
मंज़िल की सम्त जब तो हवाओं में गर्द है

फिर हश्र हो न जाए बपा काएनात में
बीमार-ए-ग़म के होंटों पे इक आह-ए-सर्द है

वो राह-ए-हक़ में मौत से डरता नहीं कभी
जो आलम-ए-हयात का जाँ-बाज़ मर्द है

लिल्लाह दो-घड़ी के लिए देख भी तो जा
तेरे मरीज़-ए-इश्क़ की अब नब्ज़ सर्द है

'अख़्तर' बता जुनून-ए-मोहब्बत है क्या बला
कहते हैं आज-कल कि तू सहरा-नवर्द है

- Akhtar Madhupuri

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