जो क़ैस का था कहीं मेरा भी वो हाल न हो
इलाज-ए-हिज्र से बेहतर तो है विसाल न हो
कोई गुरेज़ नहीं उस को मेरी ख़ुद-कुशी से
है शर्त आख़िरी में उस का फ़ोन कॉल न हो
कहानी में मिरा किरदार फीका पड़ गया था
सो अगले यार की सूरत परी जमाल न हो
मैं आँख सी के तिरे ख़्वाब देखने लगा हूँ
कि नींद टूटने का कोई भी सवाल न हो
तू मझसे दूर रहे और ये भी मुमकिन हो
किसी भी एक ग़ज़ल में तिरा ख़याल न हो
ये कंगन आज भले लौटा दो प ध्यान रहे
पराई सम्त जो खनके तुम्हें मलाल न हो
— Akhil Saxena















