किए है हम ने तो ऐसे सफ़र भी
न था राहों में साया-ए-शजर भी
कटे इस तरह अपने बालों पर भी
अदा हक़ कर न पाए नोहागर भी
मुदावा कैसे होता दर्द-ए-दिल का
मिला कोई ना हम को चारा-गर भी
हमीं खलते है आँधी की नज़र में
हमीं तो हैं चिराग़-ए-रहगुज़र भी
मेरी मिट्टी तो कब से मुंतज़िर है
कहाँ है जाने मेरा कूज़ा गर भी
— Asif Kaifi















