सागर से भी गहरी औरत
पर्वत से भी ऊँची औरत
सब को है खाना वो देती
भूके सोने वाली औरत
रौशन घर को अपने करती
ख़ुद है जलती रहती औरत
बच्चों ,अपनों की ही ख़ातिर
ख़ुद को फिर क्यूँ भूली औरत
चन्दन सपनों को दफ़ना कर
तुम मत बनना ऐसी औरत
— Chandan Mishra
पर्वत से भी ऊँची औरत
सब को है खाना वो देती
भूके सोने वाली औरत
रौशन घर को अपने करती
ख़ुद है जलती रहती औरत
बच्चों ,अपनों की ही ख़ातिर
ख़ुद को फिर क्यूँ भूली औरत
चन्दन सपनों को दफ़ना कर
तुम मत बनना ऐसी औरत
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