है निदा में सरकशी भी दिलकशी भी मयकशी भी
और ग़ज़ल में बेकली ही बेकसी भी बेबसी सी
तुम चलो उस का परी चेहरा मुलाइम जिस्म छोड़ो
उस की आँखें देखी हैं होगी मोहब्बत लाज़िमी ही
क्यूँ मेरे अपने हुए जाते हैं मुझ से दूर बोलो
ऐसे में तो पूछ लेते हैं न हालत अजनबी भी
जाने वाला तो कभी आया नहीं वापस मगर दोस्त
मुंतज़िर ने मुंतज़र की राह देखी उम्र भर ही
आज कल तो लड़कियों को चाहिए बस एक नौकर
और नौकर भी वो जिस की हो लगी इक नौकरी भी
एक लड़की को मिले दिल खेलने को तिफ़्ली से ही
और लड़के को न मिल पाया था खाना पेट भर भी
हैं नदी सागर शजर कितने तो है मख़्लूक़ अल्लाह
दिल बता फिर भी हमें दुनिया लगी क्यूँ मुख़्तसर ही















