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कुछ दहशत हर बार ख़रीदा  - Dhruv Gupt

कुछ दहशत हर बार ख़रीदा
जब हम ने अख़बार ख़रीदा

सच पे सौ सौ पर्दे डाले
सपना इक बीमार ख़रीदा

उस के भीतर भी जंगल था
कल जिस ने घर-बार ख़रीदा

एक मुश्त में दिल दे आया
टुकड़ा टुकड़ा प्यार ख़रीदा

भोली सी मुस्कान की ख़ातिर
कितना कुछ बे-कार ख़रीदा

हम बे-मोल लुटा देते हैं
तुम ने जो हर बार ख़रीदा

प्यार से भी हम मर जाते हैं
आप ने क्यूँ हथियार ख़रीदा

Dhruv Gupt
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