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जब कोई ज़ख़्म उभरता है किनारों जैसा  - Dildar Hashmi

जब कोई ज़ख़्म उभरता है किनारों जैसा
दिल तड़पता है मिरा मौज के धारों जैसा

जब कोई अक्स चमकता है सितारों जैसा
मेरा क़द भी नज़र आता है मिनारों जैसा

तेरे ही दर पे मुझे आ के सुकूँ मिलता है
इक सहारा भी नहीं तेरे सहारों जैसा

आज भी सब के दिलों पे है हुकूमत जिस की
वो चटाई पे भी लगता है दुलारों जैसा

मेरे ही दम से महकता है गुलिस्ताँ फिर भी
सब की आँखों में खटकता हूँ मैं ख़ारों जैसा

अब तो सूखे हुए पत्ते ही नज़र आते हैं
मेरे आँगन में बहुत कुछ था बहारों जैसा

आइना कौन दिखाएगा मुझे ऐ 'दिलदार'
मेरे दुश्मन का भी बरताव है यारों जैसा

Dildar Hashmi
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