0

ख़ार को फूल कहो दश्त को गुलज़ार कहो  - Dilkash Sagari

ख़ार को फूल कहो दश्त को गुलज़ार कहो
और इस जब्र को आज़ादी-ए-अफ़्कार कहो

जिन के हाथों में अलम और न कमर में शमशीर
वो भी कहते हैं हमें क़ाफ़िला-सालार कहो

मैं तो इक शोख़ के दामन से करूँगा ता'बीर
तुम उसे शौक़ से बुत-ख़ाने की दीवार कहो

ज़ुल्फ़ बहके तो उसे बाद-ए-बहाराँ समझो
चाँद निकले तो उसे शो'ला-ए-रुख़्सार कहो

कज-कुलाहों के लिए संग-ए-मलामत भी हैं फूल
सर पे आएँ तो इन्हें ज़ीनत-ए-दस्तार कहो

मेरे शे'रों में धड़कता है दिल-ए-मुस्तक़बिल
मुझ को चाहो तो नए दौर का फ़नकार कहो

मैं ने ढाए हैं रिवायात के बोसीदा महल
तुम मुझे शौक़ से 'ग़ालिब' का तरफ़-दार कहो

Dilkash Sagari
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Dilkash Sagari

As you were reading Shayari by Dilkash Sagari

Similar Writers

our suggestion based on Dilkash Sagari

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari