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जो बुझ चुके हैं वो लम्हे उजालता क्यों है  - Dilkash Sagari

जो बुझ चुके हैं वो लम्हे उजालता क्यों है
मिरे बदन पे ख़राशें भी डालता क्यों है

मैं मो'तरिज़ तो नहीं हूँ मगर ये समझा दे
जो मारना है तो दुनिया को पालता क्यों है

तुझे तलाश है जिस की वो तेरी ज़ात में है
ये कोह-ओ-बन ये समुंदर खँगालता क्यों है

नहीं है वो तिरा कोई तो फिर ज़रूरत क्या
तू उस के हुस्न को शे'रों में ढालता क्यों है

अगर नहीं हूँ मैं मानिंद-ए-मेहर-ओ-मह तो मुझे
ज़मीं से कोई फ़लक पर उछालता क्यों है

शिकस्त-ओ-मर्ग में जब तर्ज़-ए-आसमाँ है तो फिर
तू अपने टूटे हुए पर सँभालता क्यों है

न मैं रसूल न हादी न पेशवा न इमाम
मुझे तू मेरे वतन से निकालता क्यों है

Dilkash Sagari
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