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कितने मेले हैं आसमानों में  - Dilkash Sagari

कितने मेले हैं आसमानों में
और हम बंद हैं मकानों में

नस्ल-ए-आदम निकल के ग़ारों से
आ गई है किताब-ख़ानों में

लोग करते हैं इंतिज़ार मिरा
तीर खींचे हुए कमानों में

अज़दहे हैं ब-सूरत-ए-अश्या
सर उठाए हुए दुकानों में

हम वो सहरा-नवर्द हैं जिन का
नज्द फैला है आसमानों में

साअ'तों से गुज़र रही है रात
आग रौशन रखो मकानों में

Dilkash Sagari
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