0

किस के सपनों से मिरी नींद सजी रहती है  - Dinesh naaidu

किस के सपनों से मिरी नींद सजी रहती है
जागता हूँ तो इन आँखों में नमी रहती है

ढूँढता रहता हूँ बे-सुध मैं किसी माचिस को
एक सिगरेट मिरे होंटों से लगी रहती है

एक तस्वीर सलीक़े से रखी है घर में
बाक़ी हर चीज़ तो बस यूँ ही पड़ी रहती है

ऐसे आलम में जहाँ कोई नहीं कहता कुछ
ये सदाओं की फ़ज़ा कैसे बनी रहती है

ढलता जाता हूँ अँधेरों में मैं रफ़्ता-रफ़्ता
चाँदनी दूर कहीं दूर खड़ी रहती है

मैं तिरे पास ख़लाओं में पहुँच जाता हूँ
और इक लाश कहीं घर में पड़ी रहती है

Dinesh naaidu
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Dinesh naaidu

As you were reading Shayari by Dinesh naaidu

Similar Writers

our suggestion based on Dinesh naaidu

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari