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मुझ में आबाद सराबों का इलाक़ा करने  - Dinesh naaidu

मुझ में आबाद सराबों का इलाक़ा करने
फिर चली आई तिरी याद उजाला करने

दिन मिरा फिर भी किसी तौर गुज़र जाएगा
रात आएगी उदासी को कुशादा करने

और बे-वक़्त चला आता है सावन मुझ में
एक गुज़रे हुए मौसम का तक़ाज़ा करने

मैं ने जलते हुए सहरा में तिरा नाम लिया
साएबाँ ख़ुद ही चला आया है साया करने

कैसा लावा है तह-ए-आब यहाँ आँखों में
कौन आया है समुंदर को जज़ीरा करने

Dinesh naaidu
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