vo log bahut khush-qismat the | वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे

  - Faiz Ahmad Faiz

वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

  - Faiz Ahmad Faiz

Ulfat Shayari

Our suggestion based on your choice

    लड़ सको दुनिया से जज़्बों में वो शिद्दत चाहिए
    इश्क़ करने के लिए इतनी तो हिम्मत चाहिए

    कम से कम मैंने छुपा ली देख कर सिगरेट तुम्हें
    और इस लड़के से तुमको कितनी इज़्ज़त चाहिए
    Read Full
    Nadeem Shaad
    81 Likes
    एक दरवेश को तिरी ख़ातिर
    सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है
    Ammar Iqbal
    43 Likes
    मेरी अक्ल-ओ-होश की सब हालतें
    तुमने साँचे में जुनूँ के ढाल दी

    कर लिया था मैंने अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
    तुमने फिर बाँहें गले में डाल दी
    Read Full
    Jaun Elia
    59 Likes
    हर लड़के में एक ख़राबी होती है
    उसको अपना इश्क़ इबादत लगता है
    Saurabh Sharma 'sadaf'
    56 Likes
    वफ़ा का ज़ोर अगर बाज़ुओं में आ जाये
    चराग़ उड़ता हुआ जुगनुओं में आ जाये

    खिराजे इश्क़, कहीं जा के तब अदा होगा
    हमारा खून अगर आँसुओं में आ जाये
    Read Full
    Hashim Raza Jalalpuri
    22 Likes
    इश्क़ जिसको सभी समझते हैं
    वहम है लज़्ज़त-ए-रसाई का
    Kaif Uddin Khan
    मुझमें है क्या कमी ये बतला दो
    कैसों कैसों को मिल गया है इश्क़
    Shadab Asghar
    रास्ता जब इश्क का मौज़ूद है
    फिर किसी की क्यूँ इबादत कीजिये?

    ख़ुदकुशी करना बहुत आसान है
    कुछ बड़ा करने की हिम्मत कीजिये
    Read Full
    Bhaskar Shukla
    43 Likes
    अच्छी लड़की ज़िद नहीं करते
    देखो इश्क़ बुरा होता है
    Ali Zaryoun
    90 Likes
    मुझे उससे मुहब्बत सच बड़ी महँगी पड़ेगी
    अकेलेपन से उसने इश्क़ ऐसा कर लिया है
    Anukriti 'Tabassum'

More by Faiz Ahmad Faiz

As you were reading Shayari by Faiz Ahmad Faiz

    आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
    इस के बा'द आए जो अज़ाब आए

    बाम-ए-मीना से माहताब उतरे
    दस्त-ए-साक़ी में आफ़्ताब आए

    हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चराग़ाँ हो
    सामने फिर वो बे-नक़ाब आए

    उम्र के हर वरक़ पे दिल की नज़र
    तेरी मेहर-ओ-वफ़ा के बाब आए

    कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
    आज तुम याद बे-हिसाब आए

    न गई तेरे ग़म की सरदारी
    दिल में यूँ रोज़ इंक़लाब आए

    जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम
    जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए

    इस तरह अपनी ख़ामुशी गूँजी
    गोया हर सम्त से जवाब आए

    'फ़ैज़' थी राह सर-ब-सर मंज़िल
    हम जहाँ पहुँचे कामयाब आए
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz
    रह-ए-ख़िज़ाँ में तलाश-ए-बहार करते रहे
    शब-ए-सियह से तलब हुस्न-ए-यार करते रहे

    ख़याल-ए-यार कभी ज़िक्र-ए-यार करते रहे
    इसी मताअ' पे हम रोज़गार करते रहे

    नहीं शिकायत-ए-हिज्राँ कि इस वसीले से
    हम उन से रिश्ता-ए-दिल उस्तुवार करते रहे

    वो दिन कि कोई भी जब वज्ह-ए-इन्तिज़ार न थी
    हम उन में तेरा सिवा इंतिज़ार करते रहे

    हम अपने राज़ पे नाज़ाँ थे शर्मसार न थे
    हर एक से सुख़न-ए-राज़-दार करते रहे

    ज़िया-ए-बज़्म-ए-जहाँ बार बार मांद हुई
    हदीस-ए-शोला-रुख़ाँ बार बार करते रहे

    उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है
    जो गाह गाह जुनूँ इख़्तियार करते रहे
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz
    सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं
    हम लोग सुर्ख़-रू हैं कि मंज़िल से आए हैं

    शम-ए-नज़र ख़याल के अंजुम जिगर के दाग़
    जितने चराग़ हैं तिरी महफ़िल से आए हैं

    उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर
    कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आए हैं

    हर इक क़दम अजल था हर इक गाम ज़िंदगी
    हम घूम फिर के कूचा-ए-क़ातिल से आए हैं

    बाद-ए-ख़िज़ाँ का शुक्र करो 'फ़ैज़' जिस के हाथ
    नामे किसी बहार-ए-शिमाइल से आए हैं
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz
    शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई
    दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई

    बज़्म-ए-ख़याल में तिरे हुस्न की शम्अ जल गई
    दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई

    जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी
    जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई

    दिल से तो हर मोआ'मला कर के चले थे साफ़ हम
    कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई

    आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र 'फ़ैज़' न जाने क्या हुए
    रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz
    तूने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंठ
    ज़िंदगी जिनके तसव्वुर में लुटा दी हमने

    तुझपे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
    तुझको मालूम है क्यों उम्र गंवा दी हमने
    Read Full
    Faiz Ahmad Faiz
    55 Likes

Similar Writers

our suggestion based on Faiz Ahmad Faiz

Similar Moods

As you were reading Ulfat Shayari Shayari