उसे मैं ने तो ख़ुद से ही उजड़ते अब भी देखा है

तो अब उस को ही ख़ुद से ही झगड़ते अब भी देखा है

वो अपने ही ख़यालों में उलझता ही तो रहता है
अमूमन मैं ने तो उस को बिछड़ते अब भी देखा है

अकेला ही मगर लड़ कर के वो सपना तो देखा है
न उस के चाहने पर भी बिगड़ते अब भी देखा है

की ये कीचड़ के कारण पेड़ तो गलता तो बनता है
मैं तो उस पेड़ के जड़ को उखड़ते अब भी देखा है

बुलंदी पर खड़े होकर भी नीचे ही वो रहता है
उसे हर रोज़ औ' हर दिन रगड़ते अब भी देखा है

निजी जीवन से पेशे को अलग करते भी देखा है
मग़ज़ औ' दिल को रोजाना अकड़ते अब भी देखा है

— Devraj Sahu

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