देख कर वहशत निगाहों की ज़बाँ बेचैन है
फिर सुलगने को कोई इक दास्ताँ बेचैन है
काली रातों के सलीक़े दिन को क्यूँ भाने लगे
सोच कर गुम-सुम है धरती आसमाँ बेचैन है
काग़ज़ों पर हो गए सारे ख़ुलासे ही मगर
कुछ तो है जो हाशियों के दरमियाँ बेचैन है
जब से साज़िश में समुंदर की हवा शामिल हुई
कश्ती है चुप-चाप सी और बादबाँ बेचैन है
भेद जब सरगोशियों का खुल के आया सामने
शोर वो उट्ठा है अपना हुक्मराँ बेचैन है
हिज्र के मौसम की कुछ मत पूछिए उफ़ दास्ताँ
मैं यहाँ बेताब हूँ तो वो वहाँ बेचैन है
— Gautam Rajrishi















