दिलों से जब दूर होगी नफ़रत नज़र नज़र में ख़ुशी मिलेगी
जहाँ से तारीकियाँ मिटेंगी क़दम क़दम रौशनी मिलेगी
जहाँ हैं तूफ़ाँ के तेज़ धारे छुपा हुआ है वहीं पे साहिल
फ़ना की पुर-ख़ौफ़ वादियों में तुम्हें नई ज़िंदगी मिलेगी
दिलों में जिन के है अज़्म-ए-मोहकम उन्हें मिलेंगे निशान-ए-मंज़िल
भटक रहे हैं जो ज़ुल्मतों में उन्हें न मंज़िल कभी मिलेगी
अभी तो अरमान-ए-जुस्तुजू है ख़ुशी की बे-सूद आरज़ू है
पहुँच के मंज़िल पे क्या ख़बर है मिलेगा ग़म या ख़ुशी मिलेगी
जो ख़ुद-ग़रज़ हैं उन्हीं को 'अंजुम' ज़माना कहता है अपना रहबर
कि जिन के नक़्श-ए-क़दम पे चल कर फ़क़त तुम्हें गुमरही मिलेगी
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