जहाँ मशहूर थे रिश्ते निभाने से
लगा था डर वहाँ मुझ को ज़माने से
मुझे अंदर से पूरा ख़ाक करता था
तुम्हारा बात करना उस पुराने से
उसे भी ज़िंदगी भर याद आएगा
मेरा छूना वो पेंसिल के बहाने से
अधूरी थी जो अरसे से ग़ज़ल मेरी
मुकम्मल है किसी के लौट आने से
तू तो इक घाव पे ही ठहरा था 'वर्धन'
दिवाने नईं रुके थे ज़ख़्म खाने से
— Harshwardhan Aurangabadi















