सारे आँगन भी चुप हो रहे हैं

अब तो जंगल भी सब रो रहे हैं

रूह तो कब की ही मर चुकी है
अब तो हम बस बदन ढो रहे हैं

सब दरख़्तों को ये काट देते
फूल गमलों में फिर बो रहे हैं

रहते कब तक उसी वस्ल में हम
हिज्र की हम वजह हो रहे हैं

अब नहीं नींद पूरी मुनासिब
आधी ही नींद बस सो रहे हैं

सबकी करते थे हम ही हिफ़ाज़त
अब यहाँ ख़ुद ही को खो रहे हैं

ख़ाक ही तो यहाँ होते हैं सब
सब सिकंदर यहाँ जो रहे हैं

ये जो आलम मुनासिब नहीं था
हम भी इस की तरह हो रहे हैं

— Hrishita Singh

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