ग़म-ए-हस्ती न कुछ फ़िक्र-ए-दिल-ओ-जाँ है जहाँ मैं हूँ

कि हर हर गाम पर कोई निगहबाँ है जहाँ मैं हूँ

हर इक नज़्ज़ारा सौ पर्दों में पिन्हाँ है जहाँ मैं हूँ
ख़ुदा जाने कहाँ कल बज़्म-ए-इम्काँ है जहाँ मैं हूँ

हर इक जज़्बा तअ'य्युन से गुरेज़ाँ है जहाँ मैं हूँ
ग़म-ए-दिल बे-नियाज़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ है जहाँ मैं हूँ

कमाल-ए-बे-ख़ुदी मंज़िल-ब-मंज़िल काम करता है
जुनून-ए-जुस्तुजू सर-दर-गरेबाँ है जहाँ मैं हूँ

हवा में इक मुसलसल इर्तिआ'श-ए-शौक़ है पिन्हाँ
फ़ज़ा में पैहम इक बिजली सी रक़्साँ है जहाँ मैं हूँ

ग़म-ए-हासिल मुक़य्यद कर रहा है सई-ए-हासिल को
मज़ाक़-ए-आरज़ू दीवार-ए-ज़िंदाँ है जहाँ मैं हूँ

मुझे हर यौम इशरत परतव-ए-रू-ए-निगारीं है
शब-ए-ग़म साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ है जहाँ मैं हूँ

कहाँ के ऐश-ओ-ग़म कैसी मुरादें कैसे अंदेशे
कि सारी ज़िंदगी ख़्वाब-ए-परेशाँ है जहाँ मैं हूँ

जुनून इंसान के अंदाज़-ए-फ़रज़ाना को कहते हैं
ख़िरद का नाम एहसास-ए-पशेमाँ है जहाँ मैं हूँ

जो हर मंज़िल में रहबर था वो अब भी साथ है वर्ना
यहाँ हर गाम पर लग़्ज़िश का इम्काँ है जहाँ मैं हूँ

किसी से 'कैफ़' मैं राज़-ए-हक़ीक़त किस तरह पूछूँ
हर इक सूरत हर इक नज़्ज़ारा हैराँ है जहाँ मैं हूँ

— Kaif Moradaabadi

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