छोड़ उम्मीद उसे अब नहीं आना शायद
आना भी है तो नहीं हम को बताना शायद
सब्र आया है हमें अश्क-फ़िशानी से ही
मिल ही जाए कोई उस को भी बहाना शायद
उस ने अच्छा ही किया बिन मुझे बतलाए गया
जान ले लेता मिरी उस का यूँ जाना शायद
उन का अपना भी जो जाएगा बिना बतलाए
तब इस एहसास को समझेगा ज़माना शायद
वो एक दिन आएगा दरिया के किनारे 'माहम'
तब मिरी प्यास को समझेगा ज़माना शायद
— Maaham Shah















