और कोई ग़म न था क्या जमाने में
दिल दहल उठा है आधे ही पैमाने में
कोई जन्नत का नाम न ले लेना
ख़ुदा के साथ खड़ा हूँ वीराने में
और भी हैं साक़ी के तलबगार
और भी लोग हैं मय-ख़ाने में
तुम मुझ से मेरा हासिल पूछते हो
उम्र गुज़री है तुम को रिझाने में
तुम सीरत में मुझ से जुदा हो लेकिन
है तुम्हारा दर्द भी मेरे अफ़साने में
— Murli Dhakad















