रात जैसे जैसे ढलती जा रही है
कोई कसक दिल में मचलती जा रही है
कोई गुनाह कर लिया होता
उम्र नाहक़ ढलती जा रही है
तस्कीन-ए-दिल की तलाश में
मेरी हैसियत बदलती जा रही है
नहीं जुनून का मुक़ाबला इश्क़ से
हैरत है तक़रीर बदलती जा रही है
'रिंद' अब ज़िंदा नहीं रहे शायद
ज़िंदगी सँभलती जा रही है
— Murli Dhakad















