जिस को निहारते हैं सभी आसमाँ है ये
जिस के लिए निहारते हैं सब, कहाँ है ये
कोई गुज़र गया है यहाँ से अभी अभी
हाथी या कोई शे'र था किस के निशाँ है ये
बदला लिबास की जो तरह तुम ने जिस्मों को
रक्खो हया की लाज जफ़ा-कारियाँ है ये
लगता उजड़ गए हैं तुम्हारे वो ख़्वाब सब
छोड़ो नहीं समेटो इन्हें किरचियाँ है ये
तन्हाई दौड़ती है इसे काटने यहाँ
हैरत है अपने घर में ही बे-आशियाँ है ये
दुश्मन को जान मान लिया जाता है जहाँ
हम इस की बुलबुलें हैं वो हिंदोस्ताँ है ये
लगता नहीं कोई भी यहाँ अपना सा कमाल
कैसा अजीब शहर है क्या ख़ाक-दाँ है ये
— Abuzar kamaal















