तुझे ही सोचता बैठा हुआ मैं
असीरी से तेरी छूटा हुआ मैं
किसी के हाथ में आया नहीं फिर
किसी के हाथ से छूटा हुआ मैं
मुझे देखा तो की ख़्वाहिश किसी ने
गिरा आकाश से टूटा हुआ मैं
मुझे कोई मनाता क्यूँ फिरेगा
मनाता ख़ुद को हूँ रूठा हुआ मैं
करूँ क्यूँ फिर दुआ आख़िर ख़ुदा से
उसे दिखता नहीं रोता हुआ मैं
मैं सब के साथ भी ख़ुश ही था लेकिन
सुकूँ आया कि जब तन्हा हुआ मैं
ग़लतफ़हमी हुई है कोई तुम को
किसी से भी नहीं रूठा हुआ मैं
— Sanjay shajar















