है दुआ उन की अब सलामत में
थी ज़बाँ बंद जो बग़ावत में
जुर्म तेरा मगर सज़ा हम को
ऐसा होता तिरी अदालत में
छोड़ क्यूँ तुम चले गए मुझ को
थी कमी क्या मिरी इबादत में
देखते अब न वो हमें मुड़ के
कौन है करता ऐसा रुख़्सत में
काटते दिन है आज कल ऐसे
ग़ज़लें पढ़ते हुए यूँ फ़ुर्क़त में
अब मुहब्बत से दूर रहते हैं
हीर राँझा हैं मिलते जन्नत में
मुल्क की बात अब नहीं होती
ये बुरा हो गया सियासत में
लोग खाते है काट इंसाँ को
ऐसा मुमकिन था इतनी वहशत में
फेंकते हैं ये लोग अब पत्थर
जीना दूभर है ऐसी दहशत में
छोड़ हम कैसे देते सिगरेट को
है ये तोहफ़ा मिला मुहब्बत में
राम पैदा जहाँ हुए 'साहिर'
है मिली वो ज़मीं विरासत में















