Shiv
Shiv
Ghazal

वही हैं पेड़ हम पर फल नहीं लगते

ज़मीं बंजर है जिन पर हल नहीं लगते

किया था छाँव हमनें जिस भी तुर्फ़ा पर
मुकम्मल था उसे बा'दल नहीं लगते

तिरे छोड़े हुए घर अब भी प्यासे हैं
बहुत कोशिश ब'अद भी नल नहीं लगते

कभी तो थे नहीं बेताब पागल सब
बचे होते जो तुझ से झल नहीं लगते

यक़ीनन हम बड़े ख़ुश थे तुझे पा कर
चले जाने से हम ख़ुश कल नहीं लगते

— Shiv

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