ख़्वाबों की ता'बीरें भी हों
यादों की तस्वीरें भी हों
अपने उनवानों जैसी ही
काश कि कुछ तहरीरें भी हों
लाख तरीक़े मर जाने के
जीने की तदबीरें भी हों
सिर्फ़ लकीरों से क्या होगा
हाथों में तक़दीरें भी हों
सिर्फ़ उठें जो हक़ की ख़ातिर
कुछ ऐसी शमशीरें भी हों
— Vigyan Vrat















