कोई साया नज़र नहीं आता
कोई मेरा नज़र नहीं आता
झाँकता हूँ मैं झील में तो मुझे
अक्स ख़ुद का नज़र नहीं आता
शहर कोहसार से भरा था ये
अब तो ज़र्रा नज़र नहीं आता
मैं ग़ज़ल लिक्खूँ तो भला कैसे
कोई सफ़्हा नज़र नहीं आता
सब ही तन्हा जिसे समझते हैं
वो तो तन्हा नज़र नहीं आता
ग़ालिबन बादलों में छुप गया है
शम्स उगता नज़र नहीं आता
— Manish Kumar Gupta















