Faisal Hashmi

Top 10 of Faisal Hashmi

    रोज़ इस आस पे दरवाज़ा खुला रखता हूँ
    शायद आ जाए वो चुपके से कभी उस जानिब
    वो जो दुनिया से बहुत दूरी पर
    आग के ख़ौफ़ से
    सह
    में हुए इक लम्हे में
    छुप के बच्चे की तरह बैठा है
    मुंतज़िर हूँ कि कोई उस को सहारा दे दे
    जिसे वो थाम के
    ज़ुल्मत का सफ़र तय कर ले
    और मिल जाए वो मुझ से कि मिरे चेहरे पर
    मेरी आँखों ने सजा रक्खा है उम्मीद का बाब
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    Faisal Hashmi
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    मैं यही सोच के
    कल रात नहीं सोया अगर
    नींद फिर आई तो दर ख़्वाब का खुल जाएगा
    और कितने ही अज़ाबों का सितम-बार हुजूम
    सफ़-ब-सफ़ बढ़ता हुआ मेरी तरफ़ आएगा
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    Faisal Hashmi
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    अँधेरे दौड़ते हैं रात की वीरान आँखों में
    चराग़ों की जड़ों से रौशनी का ख़ून रिसता है
    समुंदर कश्तियों में
    छेद करती मछलियों से भर गए आख़िर
    मुसाफ़िर मंज़िलों की ख़्वाहिशों से डर गए आख़िर
    सदा इस क़ैद-गह से
    भाग जाने की कड़ी कोशिश में ज़ख़्मी है
    ज़मीं फ़ालिज-ज़दा होंटों की जुम्बिश से
    ठहर जाने को शायद कह रही है
    हवा की साँस ठोकर खा रही है
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    Faisal Hashmi
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    देखते देखते सब धुँद में तहलील हुए
    दश्त कोहसार फ़लक आब नबातात सभी
    बिल्डिंगें छोटी-बड़ी दूर तलक फैले घर
    इक्का-दुक्का जो कहीं लोग नज़र आते थे
    वो भी मशग़ूल थे
    बे-रूह सी सर-गर्मी में
    हर कोई नौहा-कुनाँ था कि पुरानी सदियाँ
    बूढ़ी तहज़ीब को दफ़ना के अभी लौटी हैं
    और अब ढूँढती हैं
    अन-देखे खंडर को शायद
    कैसा गम्भीर सफ़र ख़त्म हुआ आख़िर-ए-कार
    कैसी उफ़्ताद पड़ी अहल-ए-ज़मीं आज के दिन
    हम कि आग़ाज़ थे अंजाम की तमसील हुए
    देखते देखते हम धुँद में तहलील हुए
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    Faisal Hashmi
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    बादलों के ख़ून से चिपकी हुई इस शाम में
    उड़ रहे थे
    कुछ परिंदे
    लड़खड़ाती आहटों के
    कारवाँ के साथ में
    शहर गर्दी में रहा
    घर का रस्ता याद आता ही न था
    किस क़दर मैं डर गया था
    नींद की ख़ामोशियों के शोर से
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    Faisal Hashmi
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    ख़्वाब चुनती हुई आँखें हैं परिंदों की तरह
    और ये जिस्म कि जैसे कोई बे-बर्ग शजर
    ग़ैर-वाज़ेह सा तसव्वुर कोई मुबहम सा ख़याल
    किस तरह रात की दहलीज़ कोई पार करे
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    Faisal Hashmi
    4
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    जिस्म की आग कहाँ बुझती है
    लोग किस वक़्त मोहब्बत का नशा सूँघते हैं
    कितने टुकड़ों में बिखरते हैं वो
    और फिर जोड़ते हैं
    एक इक कर के बदन के आ'ज़ा
    और यही कहते हैं
    ख़ाक के क़ुर्ब की बेताब कशिश
    एक बे-फ़ैज़ सी सर-गर्मी है
    जिस्म से आगे की मंज़िल नहीं देखी हम ने
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    Faisal Hashmi
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    दूर तक फैले हुए एक घने जंगल में
    दो-शजर खींच के सायों को जहाँ मिलते हैं
    इस जगह धूप भी सूरज से मिला करती है
    ओढ़ कर शाम की फूलों-भरी चादर अक्सर
    जैसे दो शख़्स बिछड़ने के लिए मिलते हैं
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    Faisal Hashmi
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    जब ख़ाक उड़ाता हुआ नींदों का सफ़र हो
    फिर क्यूँ न किसी और ही दुनिया से गुज़र हो

    वो मेरे बराबर से निकल आया था वर्ना
    दीवार न थी ऐसी कि जिस में कोई दर हो

    मैं जिस्म से गुज़रा हूँ यही सोच के अक्सर
    शायद कि तिरी रूह का इस राह में घर हो

    ये कैसी तमन्ना है कि इस दश्त में 'फ़ैसल'
    दरिया हो किनारा हो सफ़ीना हो भँवर हो
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    Faisal Hashmi
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