रोज़ इस आस पे दरवाज़ा खुला रखता हूँ
शायद आ जाए वो चुपके से कभी उस जानिब
शायद आ जाए वो चुपके से कभी उस जानिब
वो जो दुनिया से बहुत दूरी पर
आग के ख़ौफ़ से
सह
में हुए इक लम्हे में
छुप के बच्चे की तरह बैठा है
मुंतज़िर हूँ कि कोई उस को सहारा दे दे
जिसे वो थाम के
ज़ुल्मत का सफ़र तय कर ले
और मिल जाए वो मुझ से कि मिरे चेहरे पर
मेरी आँखों ने सजा रक्खा है उम्मीद का बाब
Read Fullआग के ख़ौफ़ से
सह
में हुए इक लम्हे में
छुप के बच्चे की तरह बैठा है
मुंतज़िर हूँ कि कोई उस को सहारा दे दे
जिसे वो थाम के
ज़ुल्मत का सफ़र तय कर ले
और मिल जाए वो मुझ से कि मिरे चेहरे पर
मेरी आँखों ने सजा रक्खा है उम्मीद का बाब
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अँधेरे दौड़ते हैं रात की वीरान आँखों में
चराग़ों की जड़ों से रौशनी का ख़ून रिसता है
चराग़ों की जड़ों से रौशनी का ख़ून रिसता है
समुंदर कश्तियों में
छेद करती मछलियों से भर गए आख़िर
मुसाफ़िर मंज़िलों की ख़्वाहिशों से डर गए आख़िर
सदा इस क़ैद-गह से
भाग जाने की कड़ी कोशिश में ज़ख़्मी है
ज़मीं फ़ालिज-ज़दा होंटों की जुम्बिश से
ठहर जाने को शायद कह रही है
हवा की साँस ठोकर खा रही है
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मुसाफ़िर मंज़िलों की ख़्वाहिशों से डर गए आख़िर
सदा इस क़ैद-गह से
भाग जाने की कड़ी कोशिश में ज़ख़्मी है
ज़मीं फ़ालिज-ज़दा होंटों की जुम्बिश से
ठहर जाने को शायद कह रही है
हवा की साँस ठोकर खा रही है
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बिल्डिंगें छोटी-बड़ी दूर तलक फैले घर
इक्का-दुक्का जो कहीं लोग नज़र आते थे
वो भी मशग़ूल थे
बे-रूह सी सर-गर्मी में
हर कोई नौहा-कुनाँ था कि पुरानी सदियाँ
बूढ़ी तहज़ीब को दफ़ना के अभी लौटी हैं
और अब ढूँढती हैं
अन-देखे खंडर को शायद
कैसा गम्भीर सफ़र ख़त्म हुआ आख़िर-ए-कार
कैसी उफ़्ताद पड़ी अहल-ए-ज़मीं आज के दिन
हम कि आग़ाज़ थे अंजाम की तमसील हुए
देखते देखते हम धुँद में तहलील हुए
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वो भी मशग़ूल थे
बे-रूह सी सर-गर्मी में
हर कोई नौहा-कुनाँ था कि पुरानी सदियाँ
बूढ़ी तहज़ीब को दफ़ना के अभी लौटी हैं
और अब ढूँढती हैं
अन-देखे खंडर को शायद
कैसा गम्भीर सफ़र ख़त्म हुआ आख़िर-ए-कार
कैसी उफ़्ताद पड़ी अहल-ए-ज़मीं आज के दिन
हम कि आग़ाज़ थे अंजाम की तमसील हुए
देखते देखते हम धुँद में तहलील हुए
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दूर तक फैले हुए एक घने जंगल में
दो-शजर खींच के सायों को जहाँ मिलते हैं
दो-शजर खींच के सायों को जहाँ मिलते हैं
इस जगह धूप भी सूरज से मिला करती है
ओढ़ कर शाम की फूलों-भरी चादर अक्सर
जैसे दो शख़्स बिछड़ने के लिए मिलते हैं
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जैसे दो शख़्स बिछड़ने के लिए मिलते हैं
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जब ख़ाक उड़ाता हुआ नींदों का सफ़र हो
फिर क्यूँ न किसी और ही दुनिया से गुज़र हो
फिर क्यूँ न किसी और ही दुनिया से गुज़र हो
वो मेरे बराबर से निकल आया था वर्ना
दीवार न थी ऐसी कि जिस में कोई दर हो
मैं जिस्म से गुज़रा हूँ यही सोच के अक्सर
शायद कि तिरी रूह का इस राह में घर हो
ये कैसी तमन्ना है कि इस दश्त में 'फ़ैसल'
दरिया हो किनारा हो सफ़ीना हो भँवर हो
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