Obaid Siddiqi

Top 10 of Obaid Siddiqi

    दयार-ए-ख़्वाब से आगे सफ़र करने का दिन है
    तो क्या ये क़िस्सा-ए-जाँ मुख़्तसर करने का दिन है

    बुलावा आ गया है फिर मुझे सहरा-नवर्दी का
    यही तो ज़िंदगी को हम-सफ़र करने का दिन है

    मुझे रक़्स-ए-जुनूँ करना पड़ेगा शाम होने तक
    मुदारात-ए-हुजूम-ए-दीदा-तर करने का दिन है

    ख़िज़ाँ की बद-हवा सेी उस के चेहरे से है ज़ाहिर
    जहाँ को मौसम-ए-गुल की ख़बर करने का दिन है

    ये ख़ाशाक-ए-समाअत ख़ाक होना चाहते हैं
    ज़बाँ को आज अपनी शोला-गर करने का दिन है

    हुआ है दीदनी मंज़र ज़मीं से आसमाँ का
    क़फ़स में आरज़ू-ए-बाल-ओ-पर करने का दिन है
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    ख़ुश्क दरियाओं को पानी दे ख़ुदा
    बादबानों को रवानी दे ख़ुदा

    बे-समाअत कर दे सारे शहर को
    या मुझे फिर बे-ज़बानी दे ख़ुदा

    कब तलक बे-मोजज़ा हो कर जि
    यूँ
    कोई तो अपनी निशानी दे ख़ुदा

    छूट जाऊँ वुसअतों की क़ैद से
    वहशतों को ला-मकानी दे ख़ुदा

    सैकड़ों हम-ज़ाद हैं मेरे यहाँ
    मुझ को लेकिन मेरा सानी दे ख़ुदा
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    मुझे अब नया इक बदन चाहिए
    और उस के लिए बाँकपन चाहिए

    मैं ये सोचता हूँ असर के लिए
    सदा चाहिए या सुख़न चाहिए

    भटकने से अब मैं बहुत तंग हूँ
    ज़मीं क़ैद कर ले वतन चाहिए

    नशे के लिए इक नया शीशा हो
    और उस में शराब-ए-कुहन चाहिए

    ये आँखें ये दिल ये बदन है तिरा
    तुझे और क्या जान-ए-मन चाहिए

    बहुत तुर्श लगने लगी ज़िंदगी
    कोई मीठी मीठी चुभन चाहिए
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    मैं फ़र्द-ए-जुर्म तेरी तय्यार कर रहा हूँ
    ऐ आसमान सुन ले हुश्यार कर रहा हूँ

    इक हद बना रहा हूँ शहर-ए-हवस में अपनी
    दर खोलने की ख़ातिर दीवार कर रहा हूँ

    मालूम है न होगी पूरी ये आरज़ू भी
    फिर दिल को बे-सबब क्यूँ बीमार कर रहा हूँ

    फूलों-भरी ये शाख़ें बाँहों सी लग रही हैं
    अब क्या बताऊँ किस का दीदार कर रहा हूँ

    ये रास्ते कि जिन पर चलता रहा हूँ बरसों
    आइंदगाँ की ख़ातिर हमवार कर रहा हूँ

    आसानियों में जीना मुश्किल सा हो गया है
    मैं ज़िंदगी को थोड़ा दुश्वार कर रहा हूँ

    सा
    में बना लिया है रातों को मैं ने अपना
    ग़ज़लें सुना सुना के सरशार कर रहा हूँ
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    Obaid Siddiqi
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    मंज़र रोज़ बदल देता हूँ अपनी नर्म-ख़याली से
    शाम शफ़क़ में ढल जाती है रंग-ए-हिना की लाली से

    तुझ से बिछड़ कर ज़िंदा रहना अपने सोग में जीना है
    दिल इक फूल था ख़ुश्बू वाला टूट गया है डाली से

    शहर-ए-तरब को जाने किस की नज़र लगी है आज की शब
    रस्ते भी वीरान पड़े हैं घर लगते हैं ख़ाली से

    दुनिया वाले जिस को अक्सर रोना-धोना कहते हैं
    आँखें दरिया बन जाती है जज़्बों की सय्याली से

    धूल-भरे रस्तों के सफ़र ने तर्ज़-ए-फ़िक्र बदल डाला
    ख़ौफ़-ज़दा सी रहने लगी है ख़ाक-ए-बदन पामाली से
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    Obaid Siddiqi
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    आँखों में इक ख़्वाब है उस को यहीं सजाऊँगा
    थोड़ी ज़मीं मिली तो इक दिन बाग़ लगाऊँगा

    शहर जो तुम ये देख रहे हो इस में कई हैं शहर
    मेरे साथ ज़रा निकलो तो सैर कराऊँगा

    मेरे लिए ये दीवार-ओ-दर जैसे हैं अच्छे हैं
    इस घर की आराइश कर के किसे दिखाऊँगा

    सारी दुनिया देख रही है ख़ुशियों के अम्बार
    इतनी दौलत मत दे मुझ को कहाँ छुपाऊँगा

    ये जो अँधेरा फैल रहा है जिस्म-ओ-जाँ के बीच
    और घनेरा हो जाए तो दिया जलाऊँगा
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    Obaid Siddiqi
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    तू भी फ़रियादी हुआ था इल्तिजा मैं ने भी की
    तू न था मुजरिम अकेला हाँ ख़ता मैं ने भी की

    ज़ुल्म दोनों ने किया था दोनों थे इस में शरीक
    इब्तिदा गर तू ने की तो इंतिहा मैं ने भी की

    सिर्फ़ तू ने ही नहीं की जुस्तुजू-ए-चारा-गर
    दर्द जब हद से बढ़ा तो कुछ दवा मैं ने भी की

    किस ने क्या माँगा फ़लक से और किस को क्या मिला
    हाथ तू ने भी उठाए थे दुआ मैं ने भी की

    मैं तिरा हिस्सा न बन पाया ये अच्छा ही हुआ
    गो ये ख़्वाहिश ऐ हुजूम-दिल-रुबा मैं ने भी की

    सब्ज़ा-ए-बेगाना से रिश्ता मिरा कुछ कम नहीं
    इस चमन की आबयारी ऐ घटा मैं ने भी की
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    मैं ख़्वाब अपने सारे नीलाम कर रहा हूँ
    और ये भी जान लो कि बे-दाम कर रहा हूँ

    इस से ग़रज़ नहीं है बोली लगेगी कैसे
    जो काम करना है बस वो काम कर रहा हूँ

    वो सब कहानियाँ जो पूरी नहीं हुई थीं
    तहरीर आज उन का अंजाम कर रहा हूँ

    थक-हार सा गया था मैं राह चलते चलते
    साया जो मिल गया है आराम कर रहा हूँ

    सैर-ए-जहाँ की फ़ुर्सत मिलती कहाँ है मुझ को
    अब क्या बताऊँ तुम को क्या काम कर रहा हूँ
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    Obaid Siddiqi
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    ऐसी तन-आसानी से
    बाज़ आ जा नादानी से

    जीना मुश्किल होता है
    इतनी नुक्ता-दानी से

    सहरा भी शरमाता है
    इस दिल की वीरानी से

    लाज कहाँ तक आएगी
    ख़्वाबों की उर्यानी से

    प्यास नहीं बुझ पाती है
    दरिया की दरबानी से

    पीछा कौन छुड़ा पाया
    इस दुनिया-दीवानी से
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    Obaid Siddiqi
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    उस के परतव से हुआ है ज़ा'फ़रानी रंग का
    आईना तो आज भी है कहकशानी रंग का

    हिज्र के बादल छटे तो वस्ल की तक़्वीम में
    दिल हुवैदा हो रहा है गुल्सितानी रंग का

    पैरहन उस का है ऐसा या झलकता है बदन
    इक परी-वश रक़्स में है उर्ग़ुवानी रंग का

    आज की शब ख़ास होगी जब सुनाऊँगा उसे
    एक क़िस्सा अपना ज़ाती दास्तानी रंग का

    दोस्तों की मेहरबानी से हुआ ये काम भी
    मैं ने देखा ही नहीं था ख़ून पानी रंग का

    गर दिलों से यूँ धुआँ उठता रहेगा रात दिन
    आसमाँ कैसे बचेगा आसमानी रंग का

    हाँ उसी ने फूल टाँके होंगे इन अश्जार पर
    जिस ने मिट्टी को दिया है जुब्बा धानी रंग का
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