Yunus Tahseen

Yunus Tahseen

@yunus-tahseen

Yunus Tahseen shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Yunus Tahseen's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
दिल की दीवाना तबीअ'त को मुसीबत न बना
तुझ से याराना है याराना मोहब्बत न बना

मैं तुझे दिल की सुनाता हूँ मुझे तू दिल की
इस सुहूलत को मिरी जान अज़िय्यत न बना

हम को ले दे के तअ'ल्लुक़ ही बचा है तेरा
इस को मश्कूक न कर बाइ'स-ए-तोहमत न बना

एक दीवार ने रिश्तों का तक़द्दुस तोड़ा
भाई रोका था तुझे घर में ये ला'नत न बना

नींद को ताक़ पे धर और दिया पहलू में
गिर्या-ए-आख़िर-ए-शब में कोई दिक़्क़त न बना

बेटियाँ रिज़्क़ में बरकत का सबब होती हैं
घर की रहमत को ग़लत सोच से ज़हमत न बना

अक्स का होना है मशरूत तिरे होने से
ख़ुद को पहचान मगर अक्स को हैरत न बना

हू-ब-हू उस की अदाओं की अदा लाज़िम है
यार की सुन्नत-ए-मसऊद को बिदअ'त न बना

इख़्तिलाफ़ात हैं इंसान का ख़ासा 'तहसीन'
बहस करनी है तो कर बहस को नफ़रत न बना
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Yunus Tahseen
हुरमत-ए-इश्क़ तुझे दाग़ लगाने का नहीं
बात बनती न बने बात से जाने का नहीं

या-ख़ुदा ख़ैर कि हम दोनों अना वाले हैं
वो बुलाने का नहीं और मैं जाने का नहीं

वहशती हूँ सो गरेबान को आ सकता हूँ
मुझ से डरने का मगर मुझ को डराने का नहीं

बूढे आ'साब कहाँ सहते हैं औलाद का दुख
मेरी तकलीफ़ मिरी माँ को बताने का नहीं

हम तो इक ऐसी ज़मीं पर हैं जहाँ लाशें हैं
तुम ने जो नक़्शा दिया था वो ख़ज़ाने का नहीं

मैं अज़ल ता-ब-अबद और अबद ता-दाइम
इस का मतलब मैं किसी एक ज़माने का नहीं

दर्स ये ख़ास हमें आल-ए-पयम्बर से मिला
सर कटाने का मगर सर को झुकाने का नहीं

मैं अबू-बक्र-ओ-अली वाला हूँ 'यूनुस-तहसीन'
मुझ को मुल्ला के मसालिक से मिलाने का नहीं
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Yunus Tahseen
ग़म की तरतीब सलीक़े से लगा सकता था
या'नी मैं रोज़ तिरा हिज्र मना सकता था

सब्र ने चीख़ गले से नहीं आगे भेजी
वर्ना दीवाना बहुत शोर मचा सकता था

ग़ैरत-ए-इश्क़ ने पत्थर का बनाया मुझ को
वर्ना मैं ख़ाक वहाँ उड़ के भी जा सकता था

तंगी-ए-दामन-ए-सद-चाक तिरा क्या रोना
मैं नुमाइश में फ़क़त ज़ख़्म दिखा सकता था

तेरी नफ़रत से अगर थोड़ी सी फ़ुर्सत मिलती
मैं मोहब्बत में बहुत नाम कमा सकता था

आप बे-कार समझ कर जिसे छोड़ आए हैं
इक वही शख़्स मिरी जान बचा सकता था

उस की मा'सूम तबीअ'त की हया ने रोका
वर्ना मैं उस को बड़े ख़्वाब दिखा सकता था

ये तो उस चेहरा-ए-पुर-नूर का जादू समझो
वर्ना दरवेश कहाँ जाल में आ सकता था

यूँही ज़हमत से अकेले मुझे बर्बाद किया
ज़िंदगानी मैं तिरा हाथ बटा सकता था

तुम ही 'तहसीन' मिरी क़द्र नहीं कर पाए
मैं तो वो था जो गया वक़्त भी ला सकता था
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Yunus Tahseen
हर वक़्त मिरे सामने इक जल्वागरी है
मैं देख न पाऊँ तो मिरी कम नज़री है

मैं आँख झपकता हूँ तो मंज़र नहीं रहता
ऐ हुस्न-ए-दिल-आवेज़ अजब मुख़्तसरी है

सोचूँ तो यहाँ कुछ भी नहीं देखने क़ाबिल
देखूँ तो तिरी दुनिया बड़ी रंग भरी है

दुख दर्द यहाँ आएँ तो वापस नहीं जाते
ये दिल कोई आसेब-ज़दा बारा-दरी है

मैं दश्त में आ कर भी कहाँ चैन से बैठा
याँ पर भी वही इश्क़ वही दर-ब-दरी है

प्यारे मिरे अल्फ़ाज़ को तो बार-ए-दिगर देख
ये शे'र नहीं नौहा-ए-बे-बाल-ओ-परी है

ये फ़ैज़ मिला इश्क़ में दरयूज़ा-गरी से
सुल्तानी मिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा पे धरी है

'तहसीन' मज़ामीन-ए-ग़ज़ल और निकालो
ये दौर मोहब्बत की मुसीबत से बरी है
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Yunus Tahseen
ऐन मस्ती में हूँ दिल दुनिया से बेगाना है
क्यूँकि अब पेश-ए-नज़र जल्वा-ए-जानाना है

हश्र के रोज़ मुलाक़ात का परवाना है
हौज़-ए-कौसर मिरे महबूब का मय-ख़ाना है

चार उंसुर के तराशे को तू एँवीं न समझ
ज़र्रा ज़र्रा मिरी तौक़ीर में दीवाना है

अव्वल अव्वल मुझे तख़्लीक़ किया था उस ने
अर्श के नीचे का सारा मिरा काशाना है

बादा-ए-नूर के दो क़तरे हैं ये रात और दिन
आँख बे-अंत की गहराई का पैमाना है

जिस को फ़ानूस में शो'ले की समझ आ जाए
उस के आगे न कोई मजनूँ न दीवाना है

जिस्म का जिस्म से कुछ दिन का तअ'ल्लुक़ होगा
रूह का रूह से आग़ाज़ का याराना है

वस्ल ही अस्ल है 'तहसीन' परेशाँ मत हो
हिज्र-ए-आदम से हुए जुर्म का जुर्माना है
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Yunus Tahseen
कलेजे कर्ब सहते सहते छलनी हो चुके हैं
मगर अब क्या करें हम इस के आदी हो चुके हैं

हमारे सामने से इश्क़-ओ-उल्फ़त को उठा ले
ये क़िस्से हम तक आते आते रद्दी हो चुके हैं

सितम ऐ गर्दिश-ए-दौराँ किसे दुखड़े सुनाएँ
दिलासा देने वाले हाथ मिट्टी हो चुके हैं

तो क्या प्यासों को पानी भी पिलाने से गए हम
तो क्या ये मान लें हम लोग कूफ़ी हो चुके हैं

हमारे शहर से मुमकिन हो तो बच कर गुज़र जा
हमारे शहर के सब लोग वहशी हो चुके हैं

अरे हैरत से क्या देखे हैं आँखों को हमारी
ये मश्कीज़े तो इक मुद्दत से ख़ाली हो चुके हैं

जो मौज़ूँ हैं उन्हें क़ीमत मुनासिब ही मिलेगी
मगर सस्ते बिकेंगे वो जो दाग़ी हो चुके हैं

हमारा नाम नामों से अलग लिख्खेगी दुनिया
कि हम तेरी मोहब्बत में मिसाली हो चुके हैं
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Yunus Tahseen
दुनिया-ए-ख़राबात से पहले भी कहीं था
मैं अपनी मुलाक़ात से पहले भी कहीं था

आलम तो अभी कल के हैं तख़्लीक़ मिरे दोस्त
मैं अर्ज़-ओ-समावात से पहले भी कहीं था

मैं आज भी हूँ कल भी कहीं हूँगा यक़ीनन
और अर्सा-ए-औक़ात से पहले भी कहीं था

कहते थे मलाएक कि ये इंसान है फ़ित्ना
या'नी कि मैं ख़दशात से पहले भी कहीं था

लोगों को तो इदराक मिरा आज हुआ है
मैं सारी ख़ुराफ़ात से पहले भी कहीं था

हर शय की मिरे दम से ही पहचान हुई है
मैं कश्फ़-ओ-करामात से पहले भी कहीं था

मैं हज़रत-ए-इंसान अनल-इश्क़ अनल-हुस्न
आदम की हिकायात से पहले भी कहीं था

हर चीज़ मिरे वास्ते रक़्साँ है जहाँ की
मैं महफ़िल-ओ-नग़्मात से पहले भी कहीं था

जिस रात ख़ुदा-पाक ने इक़रार लिया था
'तहसीन' मैं उस रात से पहले भी कहीं था
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Yunus Tahseen