Yusuf Kamran

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@yusuf-kamran

Yusuf Kamran shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Yusuf Kamran's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Nazm
मैं यूसुफ़ हूँ मुझे भी भाइयो
कुएँ में फिंकवाओ
कि मैं ने ख़्वाब में देखे हैं
सूरज चाँद और तारे
मुझे कुएँ में फिंकवाओ
कि मुझे को क़ाफ़िले वाले भरे बाज़ार में बेचें
मुझे फिर क़ैद में डाले
वो जिस को मुझ से रग़बत है
मुझे जब क़ैद में डाले
तो मैं ख़्वाबों की ताबीरों से
फिर वो मर्तबा पाऊँ
कि मुल्कों के ख़ज़ानों का मुहाफ़िज़ मैं भी कहलाऊँ
मैं जब देखूँ तुम्हें पहचान लूँ
पर तुम न पहचानो
मैं यूसुफ़ हूँ मुझे भी भाइयो
कुएँ में फिंकवाओ
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रात फिर यूँ हुआ
अध खुले आसमाँ पर परिंदों की चीख़ों में लिपटे हुए
ख़्वाहिशों के बदन
तिलमिलाने लगे
मेरे कानों में मेरे दहकते हुए ख़ून की
रंग की नूर की सीटियाँ सी बजीं
फिर इरादों की छाती में नीली रगें मुंजमिद हो गईं
फिर बदन की फ़सीलों के साए बने
जुम्बिशों में वही सरसराहट हुई
फिर मिरे जिस्म की दूधिया चाँदनी
हर तरफ़ छा गई
और मैं
जिस्म-ओ-जाँ की शिकन-दर-शिकन उलझनों को समेटे हुए
सो गया
रात फिर यूँ हुआ
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एक छोटे से क़द का हथौड़ा लिए
मैं भी इक पालतू जानवर की तरह
वर्कशॉप की ख़ंदक़ में फेंका गया
मेरे अज्दाद ने इन रिवायात को ज़िंदा रखने की ख़ातिर
मिरे जिस्म पर
टायरों और सड़कों की मिट्टी मली
टीन की छत के नीचे बदन पक गया
जिस्म-ओ-जाँ बे-अमाँ उलझनों में घिरा
अब मशीनों के पुर्ज़ों में दिन रात यूँ
मोबिल ऑयल की चिकनाहटें जज़्ब करता है
जैसे यही
ज़िंदगी है मिरी
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मिरे सामने आइना है कि जिस में
मुझे अपनी सूरत नज़र आ रही है
मैं अपने ही चेहरे पे लिक्खी हुई दास्तानों को पढ़ता हूँ
और सोचता हूँ
कि जिन इजतिमाई मसाइल को मैं ने
निगाहों के फैले हुए खंडरों में
समोया हुआ है
उन्हें कौन समझे
उन्हें कौन जाने
मुझे मुर्दा नस्लों के उस्लूब से हट के कहने की पादाश में
इस ज़माने ने मुजरिम बनाया
मिरी गुफ़्तुगू को मुअ'म्मा बनाया
मिरी ज़ात में दफ़्न है इक ज़माना
उसे कोई मेरी निगाहों से देखे
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तू कभी रातों की तन्हाई में मेरे पास आ
मेरे कानों से मिरी ख़ामोशियों के साज़ सुन
तू मिरी आवाज़ सुन
मेरी आँखों में मचलते मोतियों के रंग देख
तू कभी क़ल्ब-ओ-नज़र की जंग देख
देख मैं किन एहतियातों के सुनहरी जाल को
दर्द में डूबी हुई छाँव के इस जंजाल को
आरज़ूओं के झरोकों में सुलगती हड्डियों के गिर्द चिमटाए हुए
ख़्वाहिशों की आग को फिर ध्यान की चुनरी में कफ़्नाए हुए
मुंतज़िर हूँ फिर उसी आवाज़ का
ज़िंदगी के साज़ का
तू कभी रातों की तन्हाई में मेरे पास आ
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आओ दूर चलें
पीपल की हरी हरी छाँव में
बैठ के दिल बहलाएँ
शहर की इस गहमा-गहमी में अब तो जी घबराता है
रानी देखो इस नगरी में न कोई कृष्न न राधा है
ये तो शहर है प्यारी
कारोबारी दुनिया है
मन से ख़ाली तन वाले हैं
धन ही उन का गहना है
झूटी रस्में झूटे बंधन झूटा उन का प्यार
कारोबारी ज़ेहनों वाले होते हैं खूँ-ख़्वार
धन दौलत में तोल के देखें
हर निर्धन का प्यार
शहर में क्या रक्खा है
आओ दूर चलें
हरे भरे खेतों में चल के अपने ज़ख़्म सिएँ
दूर कहीं मंदिर के पीछे बैठ के दिल बहलाएँ
दूर कहीं पीपल के नीचे मन की जोत जगाएँ
आओ ग़म को भूल भी जाएँ
आओ शहर से दूर चलें
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मैं तन्हा था
मैं तन्हा हूँ
मैं तन्हा ही रहूँ शायद
मिरे कमरे की दीवारें
मुझे खाने को आती हैं
अभी कुछ देर पहले
लोग मिलने को बहुत आए
अभी कुछ और आएँगे
मिरे और उन के सब के दरमियाँ
दीवार हाइल है
मगर वो मैं जिसे चाहूँ
कि आ जाए
न आएगी
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कल शाम नहर की पटरी के साथ साथ
मैं अपने ना-तवाँ कंधों पर
एक शिकस्ता बोरी उठाए जा रहा था
कि चीख़-ओ-पुकार शुरूअ' हुई
पकड़ो पकड़ो क़ातिल क़ातिल

नहर पर मुतअय्यन पुलीस चौकी के मुस्तइद अमले ने
संगीनों से मेरा तआ'क़ुब किया
मैं अपनी तमाम-तर क़ुव्वत से भागने के बावजूद
चंद ही लम्हों में उन की आहनी गिरफ़्त में था

पुलीस चौकी में सवालों की बोछाड़ से
मेरी क़ुव्वत-ए-गोयाई जवाब दे गई
एक मकरूह सूरत मोंछों वाला बा-वर्दी शख़्स
वहशत-नाक आँखों से अमले की तरफ़ देखते हुए
अपनी शदीद करख़्त आवाज़ में चीख़ा
बोरी का मुँह खोलो
सारा अमला शश्दर रह गया
कि बोरी में लिपटी हुई लाश मेरी ही थी
और मैं चुप साधे उसे तक रहा था
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सर्दियों के मौसम में पिछली रात को छत पर
हम जो एक दूजे से चाँदनी की बारिश में
बे-ज़बान जज़्बों की ख़ुशबुओं से मिलते थे
हुस्न-ए-दिलरुबा तेरा लफ़्ज़ की हक़ीक़त से कितना बे-तअल्लुक़ था
अन-कहा सुना सब कुछ लम्हा-ए-मसर्रत था
जब से लब-कुशाई के सिलसिले हुए जारी
तेरी मेरी बहसों ने
अन-कहा सुना सब कुछ
मंतिक़ों दलीलों के वाहिमों से गदलाया
और फिर मोहब्बत के सब गुलाब सँवलाए
आज अज्नबिय्यत की बे-समर फ़ज़ाओं में
हम कि एक दूजे से कितने बे-तअल्लुक़ हैं
अव्वलीं रिफ़ाक़त की सारी ख़स्लतें खो कर
इस बिसात-ए-हस्ती पर
सिर्फ़ दो पयादे हैं
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कभी लड़कियों के तनोमंद जिस्मों में
सूरज की ताबानियाँ देखने को
मकानों की छत पर खड़े हो के यारो
जो हम नंगे पाँव के तलवे जलाते
तो अपने बदन की हरारत से सारी नसें फड़फड़ातीं
मगर लड़कियों को ख़बर तक न होती

अगर अब मकानों की ऊँची छतों पर
खड़े हो के तुम ने
तनोमंद जिस्मों में सूरज की ताबानियाँ देखनी हों
तो तलवे जलाने से बेहतर यही है
कि कुछ गुनगुनाओ
तुम्हारे बदन की नसें सर्द करने को
सब लड़कियाँ बा-ख़बर हो चुकी हैं
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ये आग पानी हवा ये मिट्टी
ये वाहिमों की करिश्मा-साज़ी
ये इल्म-ओ-फ़न के तमाम क़िस्से
ये अक़्ल-ओ-दानिश की सारी बातें
ये सब दिलासे बनावटी हैं
मैं दोस्तों दुश्मनों की ज़द में हूँ
हर कोई पेश-गोइयों के दराज़ क़िस्से सुना रहा है
कि सब को अपने करंसी नोटों की फ़िक्र है
हर कोई तलब और रसद के चक्कर में
अपने भाव चढ़ा रहा है
खुली फ़ज़ाओं में पर समेटे हुए परिंदे भी
आने वाली सऊबतों के मुहीब मंज़र दिखा रहे हैं
ये क्या है सब कुछ कि कुछ नहीं है
हवास की दस्तरस से बाला
मिरे लिए सिर्फ़ वो सदाक़त है
जो मिरे जिस्म-ओ-जाँ को छू कर गुज़र रही है
कि मैं हक़ीक़ी मुशाहिदों तजरबों की भट्टी में जल रहा हूँ
ये आग पानी हवा न मिट्टी है
सिर्फ़ मैं हूँ
ये सिर्फ़ मैं हूँ
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मेरे हाथों ने तुझ को छुआ तक नहीं
मुझ को सूरज की उस रौशनी की क़सम
तू कहीं भी रहे
मैं कहीं भी रहूँ
दिल तिरे पास है
मैं अज़ल से अबद तक तिरे साथ हूँ
तू मिरे साथ है
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सजा सजाया ये घर सलीक़े की सारी चीज़ें
तमाम कमरों में किस क़रीने से सज रही हैं
ये बंद अलमारियों में रक्खी हुई किताबें
ये टेलीविज़न ये रेडियो ये फ्रीज ये सोफ़े
ये मेज़ कुर्सी ये नर्म बिस्तर
ये बिस्तरों की गुदाज़ रातें
हसीन सुब्हें
ये मेरी बीवी ये मेरे बच्चे
ये सारी आसाइशें ये रस्में
ये सारे रिश्ते ये सारे बंधन
मैं जिन की साँसों में बस रहा हूँ
ये सब तो मेरे हैं मैं कहाँ हूँ
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किताबों का रसिया
वो इक शख़्स जो चुप की चादर लपेटे
बहुत दिल-गिरफ़्ता
यहाँ घूमता है
उसे मेरी जानिब से इतना बता दो
किताबों में लफ़्ज़ों की जादूगरी के सिवा
कुछ नहीं है
किताबें जला दो
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यहाँ न कोई दरख़्त होगा
न फूल पत्ते न घास शबनम
न चाँद रातों को अपना चेहरा दिखा सकेगा
न दिन को सूरज
हवा सलाख़ों से सर पटख़ कर
गले में फंदा लिए यूँही दर-ब-दर फिरेगी
ये मेरी धरती यूँही रहेगी
ख़िज़ाँ हवाओं ने उस की शादाबियों के मंज़र उजाड़ने को
वो गुल खिलाए
क़ज़ा भी क़िस्तों में आ रही है
मिरा वतन एक बूढे बरगद की शाख़-ए-नाज़ुक बना हुआ है
मिरी दुआ है
कि मैं भी कर्ब-ओ-बला से गुज़रूँ
कि ऐसे शादाब मंज़रों का उजाड़-पन
मैं न देख पाऊँ
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