ऐसी हालत नहीं हुई होती
गर मुहब्बत नहीं हुई होती
ज़िंदगी किस तरह बसर करते
तेरी चाहत नहीं हुई होती
हम दीवानों पे वो ही हँसता है
जिस को उल्फ़त नहीं हुई होती
रफ़्ता रफ़्ता तुझे भुलाते अगर
तेरी आदत नहीं हुई होती
— Zeeshan kaavish
गर मुहब्बत नहीं हुई होती
ज़िंदगी किस तरह बसर करते
तेरी चाहत नहीं हुई होती
हम दीवानों पे वो ही हँसता है
जिस को उल्फ़त नहीं हुई होती
रफ़्ता रफ़्ता तुझे भुलाते अगर
तेरी आदत नहीं हुई होती
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