शब जुदाई की अब ढल रही है
वस्ल की राह पर चल रही है
इश्क़ में मैं ही पागल नहीं था
थोड़ा वो भी तो पागल रही है
रात करवट पे करवट बदल कर
हिज्र की आग में जल रही है
वक़्त फ़ाक़ों पे गुज़रा है अक्सर
यूँ ग़रीबी मुसलसल रही है
ऐ ज़फर हर किसी की दुआ से
हर दुआ माँ की अफज़ल रही है
— Zafar Siddqui















