जाँ हो चुकी फ़रार तुझे देर हो गई
आने में मेरे यार तुझे देर हो गई
मय्यत भी उठ गई मिरी मातम भी हो चुका
ऐ मेरे ग़म-गुसार तुझे देर हो गई
ग़ैरों से ले ली मैं ने मोहब्बत उधार पर
ऐ मेरे क़र्ज़-दार तुझे देर हो गई
अहल-ए-चमन को रास अब आने लगी ख़िज़ाँ
हाँ बाद-ए-नौ-बहार तुझे देर हो गई
सर पर है आफ़्ताब मगर नींद में हूँ मैं
ऐ सुब्ह की पुकार तुझे देर हो गई
अफ़सोस उम्र-भर दर-ए-तौबा खुला रहा
लेकिन 'ज़ुहैब' यार तुझे देर हो गई
— Zohaib Azmi















