न जुनूँ है न ही ललकार में दम है, ग़म है
कैसे हाथों में मुहब्बत का अलम है, ग़म है
मैं तो ये सोच के ख़ुश था के तू ख़ुश है, लेकिन
मेरी हालत पे तेरी आँख भी नम है, ग़म है
इक ज़माना है के तू जिसपे करम फरमा है
इक दिवाना है जो महरूम ए सितम है, ग़म है
मुस्कुराना किसे अच्छा नहीं लगता, लेकिन
अपनी तक़दीर में जो चीज़ रक़म है, ग़म है
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