बेतरह हाल कर वो नदामत में मैं
रोया हूँ किस तरह फिर क़यामत में मैं
वो यूँ बिछड़ा न आया कभी लौट कर
जानता था ये होना है शिरकत में मैं
याद उस को मिरी आती होगी ज़रूर
कितना तड़पा हूँ फिर उस की हसरत में मैं
क्यूँ शफ़क़ को यूँ ही देखता रहता हूँ
डूबता है ये सूरज या ग़ैरत में मैं
ज़िक्र 'बेनाम' क्यूँ करता है उस का फिर
जीता हूँ किस तरह उस की फ़ुर्क़त में मैं
— Benaam














