बिन कहे कुछ सुनी मेरी कुछ दिन
जाने के बा'द वो रही कुछ दिन
मेरे ग़म में रही ख़ुशी कुछ दिन
वो भी था हिज्र में दुखी कुछ दिन
जिन दिनों तुझ से मिलना मुमकिन था
उन दिनों में भी तू मिली कुछ दिन
तुझ
में मैं मुझ
में तू भटकता था
तब ठिकाने लगा था जी कुछ दिन
हम ने जाना नई मोहब्बत को
मय-कदे में रहे चढ़ी कुछ दिन
मैं भी जीने लगूँगा शायद गर
चारा-गर कह दे बस वही कुछ दिन
— Chetan















