काफ़ी पत्थर हैं मेरी राहों में
पुख़्तगी है मगर इरादों में
वो जो लड़की निखारती थी मुझे
ज़िंदगी भर रहेगी यादों में
मुझ को ठगने में गाली देने में
यार शामिल हैं इन गुनाहों में
बात जो मुझ से अब नहीं करते
कोसते होंगे ख़ुद को रातों में
मिट गया है मिटाने वाला मुझे
कोई कहता है मेरे कानों में
बस उन्हें ग़ज़लें रास आती हैं
इस लिए हूँ मैं उन की आँखों में
थोड़ी बारिश भी हो रही थी जब
हाथ मेरा था तेरे हाथों में
वो मेरी नींद छीन लेती हैं
कोई जादू है तेरी आहों में
उस से जब भी मिलो तो ये कहना
'यश' को सोना था उस की बाहों में
— Yash Sharma















