मन को भाता है हमेशा पिंजरे वाला जानवर

ये ख़बर सुन भाग बैठा मेरे घर का जानवर

दर्द जो समझा नहीं है, बेड़ियों के घाव की
वो दिखावे के लिए ही पाल रक्खा जानवर

जान पाएँगे नहीं, चाबुक चलाने वाले ये
कैसे ताँगा खींचता है इक अकेला जानवर

बात गर हैवानियत की ग़ौर से सोचो कभी
फिर तो हर इंसान में, तुम को मिलेगा जानवर

जानवर, इंसान कब तक बन सकेगा, क्या कहूँ
धर्म के भी नाम पर जो मार देता जानवर

— Ranjan Kumar Barnwal

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