पागल नहीं था मैं मगर होने लगा
कुछ इस कदर दुनिया में मैं खोने लगा
सूखा पड़ा था और मैं इक बीज को
बरसात होगी सोच कर बोने लगा
रिश्ता बड़े घर जोड़कर जो ख़ुश हुआ
बेटी विदा कर बाप वो रोने लगा
सरकार ज़ुल्मी थी रहेगी और है
सत्ता मिली जिस को वही सोने लगा
पकड़ी न जाए दुश्मनी ये सोच कर
हथियार रंजन ख़ून का धोने लगा
— Ranjan Kumar Barnwal















