पुराने फल झटक डाले थे जिन मग़रूर शाख़ों ने

न उन पर गुल कभी आए सज़ा जो दी बहारों ने

किसी के पाँव में रहना भी तन्हाई से बेहतर है
मुसाफ़िर जब नहीं आया कहा हम से ये रस्तों ने

खिलौने ला न पाए हम तो हम से हो गए ग़ुस्सा
उसूलों की यहाँ क़ीमत नहीं समझी थी बच्चों ने

जो बच्चे शहर जाएँगे न लौटेंगे कभी वापस
बताया गाँव में बिछती हुई इन तेज़ सड़कों ने

बने हैं खाद मर कर भी कि फल डाली पे आ पाएँ
दरख़्तों को बचाया है दरख़्तों के ही पत्तों ने

गए हाथों से जब बच्चे हमें ये तब समझ आया
हमें क्यूँ डोर से बाँधा था इस घर के बुज़ुर्गों ने

— Saket Gupta Saaki

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