दीवानों का घर उस के जो लश्कर हो रहा है
जाने वो किसे आज मुयस्सर हो रहा है
वो राज-कुमारी तो नहीं है कोई लेकिन
पाने को उसे फिर भी स्वयंवर हो रहा है
इस साल के आख़िर में मिलेंगे ये कहा था
बस याद दिला दूँ कि दिसंबर हो रहा है
पत्थर की तरह लोग हैं क्यूँ सोचता था मैं
अब समझा हूँ जब दिल मिरा पत्थर हो रहा है
इक वक़्त जो लगता था कभी हो नहीं सकता
हम देख रहे हैं वही अक्सर हो रहा है
— Saket Gupta Saaki















