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ख़ल्वत के चक्कर से निकलना है मुझे - Saurabh Kumar

ख़ल्वत के चक्कर से निकलना है मुझे
अपने इसी घर में उछलना है मुझे

मैं दर्द-ए-दिल ख़ुद में समेटे चल रहा
बस इक यही तौ' तो बदलना है मुझे

मुझको मेरी हालात ने बतला दिया
के ज़िंदगी में बस तड़पना है मुझे

अब और जिंस-ए-ना-रवा ना है शिकस्त
उस सोच का कमरा मसलना है मुझे

ज़िक्र-ए-ख़ुदा जब भी हुआ "सौरभ" तभी
कहना नहीं अब बस झगड़ना है मुझे

- Saurabh Kumar

Dard Shayari

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