इलाज-ए-इश्क़ हो कोई यही मैं अब समझता हूँ
ब-मुश्किल ही समझता हूँ मुहब्बत जब समझता हूँ
मुझे लगता नहीं जाईज़ मैं बे-मतलब समझता हूँ
मेरा जीना भी क्या जीना मैं ख़ुदको कब समझता हूँ
तबीअत हो गई है इस क़दर अब ख़ुश–फ़रेबी में
कि मेरे दिल को मैं मस्जिद उसे मज़हब समझता हूँ
लिए जाता है मुझ को साथ मय-ख़ाने की राहों में
समझता है मुझे नादाँ मगर मैं सब समझता हूँ
निकालो मुझ को जन्नत से पटक दो फिर जहन्नम में
मुझे वो कर गई काफ़िर मैं पत्थर रब समझता हूँ
— Mohammad Talib Ansari















