भटकते फिरते हैं शहर-ए-वफ़ा से निकले हुए
बहुत मलूल हैं कू-ए-वफ़ा से निकले हुए
तिलिस्म-ए-आब सबात-ए-गुलाब अक्स-ए-चराग़
तमाम रंग हैं तेरी क़बास निकले हुए
बलाएँ फिरती हैं ख़ाली मकान में शायद
पड़े हैं दूर दरीचे हवा से निकले हुए
नवा में कर्ब वही दिल की वहशतें भी वही
गो एक उम्र हुई है बला से निकले हुए
अब इंतिज़ार यही है कि राख उड़ जाए
झुलस झुलस गए शो'ले नवा से निकले हुए
— Ahmad Azeem















