क्या कहिए राह-ए-शौक़ को किस तरह सर किया
हम ने सफ़र फ़ज़ाओं में बे-बाल-ओ-पर किया
ज़ुल्फ़ उस की हो रही थी परेशाँ हवाओं में
हम ये समझ रहे थे दुआ ने असर किया
पूछो न किस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी
मद्धम से इक दिए ने हवा में सफ़र किया
'फ़ाख़िर' गुज़र रहे हैं हम इस दौर से यहाँ
जिस ने मोहब्बतों को भी मरहून-ए-ज़र किया
— Ahmad Fakhir















